देख के तेरा रूप सलोना
मन हुआ मेरा हर्षित
कैसे कैसे रोका मन को
अंदाज़ करे आकर्षित
नयन तेरे बड़े कटीले
काट के रख दिए दिल को
कैसे कैसे मन संभाला
सोचु, कैसे काटू दुरी को
गाल की डिंपल तन के बोले
ले देख ले खुशियां तू भी
भरी हुई आत्मविशवास से तू
लगता है लिए हो गहरी साँस अभी
बैठने का अंदाज़ तेरा
है बहुत ही निराला
बड़े-बड़े पानी भरेंगे
रूप तेरा है अलबेला
जैसे देखा कि दिल हुआ
ज़रूर बात करूँ मैं तुझसे
पता नहीं किस बात से चिढ़ी
कटुता है तुझे केवल मुझसे
बात करने की भी इजाज़त
नहीं दिए तूने खुल के
चेहरे-किताब पे कुछ और बोले
और कहीं दिए वचन बुझ के
ऐसी दुविधा में अपनी गरिमा
अपनेपास ही रखना है बुद्धिमानी
है तो फासला बस एक कदम का
पर तुम बने हुए हो अभिमानी
नहीं शिकायत कोई तुझसे
होनी भी चाहिए सबको
तुझे आत्मनिर्णय ही लेनी चाहिए
जबतक दिल न कहे आगे बढ़ने को
मैं भी नहीं झुकता कहीं भी
रहता हूँ आत्मविशवास से
बस तू एक अपवाद हो गए
झुक जाता तेरे रूह की महक से
अच्छा होता कि मैं भी रहता
जीता-जागता सामान्य पुरुष
पर आत्म-परिचय के ज्ञान ने
बदल दिया मेरे मन का पुरुष
इतना सीखा ज़रूर जीवन में
किसी को न कष्ट दू कभी
मेरे लिखने से अगर तुझे कष्ट होता
कृपया बता देना ज़रूर अभी
इतने अच्छे रूह हो तुम
कि कितना भी गुस्साऊँ मन में
पर कहता- क्यों लिखता और चिढ़ाता उसे
हरवक्त फैसला जाता है तेरे ही हक़ में
पर सचमुच ऐसा मैं नहीं हूँ
तुझे देखते ही मन बैचैन हो जाता है
और गलती-सही कुछ नहीं देखता
बस तुझे निहारता लिखता जाता है
पर आज ये हक़ तुझे देता
कि बता देना ज़रूर लिखूं या न लिखूँ
बहुत टूट गया हूँ इस दुरी से
नहीं चाहता कि इस कदर लिखूँ
मन हुआ मेरा हर्षित
कैसे कैसे रोका मन को
अंदाज़ करे आकर्षित
नयन तेरे बड़े कटीले
काट के रख दिए दिल को
कैसे कैसे मन संभाला
सोचु, कैसे काटू दुरी को
गाल की डिंपल तन के बोले
ले देख ले खुशियां तू भी
भरी हुई आत्मविशवास से तू
लगता है लिए हो गहरी साँस अभी
बैठने का अंदाज़ तेरा
है बहुत ही निराला
बड़े-बड़े पानी भरेंगे
रूप तेरा है अलबेला
जैसे देखा कि दिल हुआ
ज़रूर बात करूँ मैं तुझसे
पता नहीं किस बात से चिढ़ी
कटुता है तुझे केवल मुझसे
बात करने की भी इजाज़त
नहीं दिए तूने खुल के
चेहरे-किताब पे कुछ और बोले
और कहीं दिए वचन बुझ के
ऐसी दुविधा में अपनी गरिमा
अपनेपास ही रखना है बुद्धिमानी
है तो फासला बस एक कदम का
पर तुम बने हुए हो अभिमानी
नहीं शिकायत कोई तुझसे
होनी भी चाहिए सबको
तुझे आत्मनिर्णय ही लेनी चाहिए
जबतक दिल न कहे आगे बढ़ने को
मैं भी नहीं झुकता कहीं भी
रहता हूँ आत्मविशवास से
बस तू एक अपवाद हो गए
झुक जाता तेरे रूह की महक से
अच्छा होता कि मैं भी रहता
जीता-जागता सामान्य पुरुष
पर आत्म-परिचय के ज्ञान ने
बदल दिया मेरे मन का पुरुष
इतना सीखा ज़रूर जीवन में
किसी को न कष्ट दू कभी
मेरे लिखने से अगर तुझे कष्ट होता
कृपया बता देना ज़रूर अभी
इतने अच्छे रूह हो तुम
कि कितना भी गुस्साऊँ मन में
पर कहता- क्यों लिखता और चिढ़ाता उसे
हरवक्त फैसला जाता है तेरे ही हक़ में
पर सचमुच ऐसा मैं नहीं हूँ
तुझे देखते ही मन बैचैन हो जाता है
और गलती-सही कुछ नहीं देखता
बस तुझे निहारता लिखता जाता है
पर आज ये हक़ तुझे देता
कि बता देना ज़रूर लिखूं या न लिखूँ
बहुत टूट गया हूँ इस दुरी से
नहीं चाहता कि इस कदर लिखूँ
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