Wednesday, July 27, 2016

सब ही नचावत राम गोसाईं

सब ही नचावत राम गोसाईं

सब ही नचावत राम गोसाईं
नर नाचत मरकट की माही
हम सोचते रहते हम करते हैं
पर दुनिया चलती बन निर्मोही

तुमने तो छोड़ दिया था
हमसे भी है मिलना जुलना 
ऐसी भी क्या खता हुई
नहीं लगता जी तेरे बिना

कल भगवन ने दया किया
और किया कुछ चमत्कार
कुछ कोशिश नहीं थी मेरी
मैं था अपने ख्याल में निहार

ऐसा हुआ-हो रहा था देर मुझे
ऑफिस की गाडी पकड़नी थी
तेजी तेजी कदम ताल था मेरा
समय पर पहुँचने की जल्दी थी 

तभी एक अंधे ने बोला
ले चल मुझे रोड तक 
मैं निरा तेरे सोच में खोया
हाँ कर दिया बेरोकटोक

सोचा बहुत कि गाडी निकल जायेगी
पर भगवत कार्य देख मैंने कर लिया
रास्ते से दिखा मेरी गाडी निकलते  हुए 
पर अंधे का हाथ मुझसे छोड़ा ना गया 

अंधे को छोड़ने के बाद 
भगवन को मैं देखा मुस्कुराते
दिल में ही सवाल किया
अब हम ऑफिस कैसे जाते 

ढूढ़ने लगा उपाय,कहने लगा किसी से
तभी एक गाडी आई,जिसमें कभी थे हम जाते
अनायास तुम दिखे-सचमुच बाँछे खिल गई 
भगवन को कहा-अच्छा ऐसे चक्कर चलाते

ऐसे ही कभी अनायास तुमसे दूर हुआ था
कितने वर्ष बीत गए पर लगता कल है बीता
नहीं चाहता था तब भी मुझे तुमसे है दूर होना
पर भगवन ने जैसा चाहा मैं तो था बस कर्ता 

एक शेर अर्ज़ है..
रह रहा हूँ अकेले तेरे जिद्द से
पर नहीं चाहता रहूँ तेरे बिना
तुम्हें सोचते लगता ये दुनिया
बहुत ही सुहाना,बहुत अपना

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