तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
तुझे देखते ही तुझसे लिपटकर रोने को मैं होता
कहता- क्यों रोके हो अबतक लिपटने से मुझको
तेरे आँखों से पूर्णता शुरू हो जाता
तेरे मदमस्त नजरें हिलोरे लेता
ये आँखें किसी को डुबोये या नहीं
पर मैं उन नयनों में डूब ही जाता
दिल करता रहता तुझसे अर्ज़ करूँ
चेहरे को मत हिलाओ तनिक भी
डूबने दो अपने इन आँखों में हमें
इंतज़ार किया ये मेरा जीवन भी
तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
आँखों से छेड़खानी करते जुल्फें
सागर में लहरें ही लहरें फैलाते
लटके झटके का नाम देकर
तेरे आँखों में हमें ना डूबने देते
घनघोर घटा सी छाती तेरी जुल्फें
दे देती हैं बरबस बारिश का आभाष
बून्द बून्द बस टपकना बाकी रहता
रीत रहा है ये सावन का मधुमाष
तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
जुल्फ़ें से हटकर नजरे मेरी
बदन की गहराई में उतरती
इधर अटकती उधर रूकती
पर तन से नजर नहीं हटती
रुक ही जाती तेरे लहराते दुपट्टों पर
देखता कहता की काश तू मिलती
तुझे मृगनयनी कहूँ नाजनीन कहूँ
इसी उधेड़बुन मेरी नजरें लगी रहती
तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
तुझे देखते ही तुझसे लिपटकर रोने को मैं होता
कहता- क्यों रोके हो अबतक लिपटने से मुझको
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
तुझे देखते ही तुझसे लिपटकर रोने को मैं होता
कहता- क्यों रोके हो अबतक लिपटने से मुझको
तेरे आँखों से पूर्णता शुरू हो जाता
तेरे मदमस्त नजरें हिलोरे लेता
ये आँखें किसी को डुबोये या नहीं
पर मैं उन नयनों में डूब ही जाता
दिल करता रहता तुझसे अर्ज़ करूँ
चेहरे को मत हिलाओ तनिक भी
डूबने दो अपने इन आँखों में हमें
इंतज़ार किया ये मेरा जीवन भी
तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
आँखों से छेड़खानी करते जुल्फें
सागर में लहरें ही लहरें फैलाते
लटके झटके का नाम देकर
तेरे आँखों में हमें ना डूबने देते
घनघोर घटा सी छाती तेरी जुल्फें
दे देती हैं बरबस बारिश का आभाष
बून्द बून्द बस टपकना बाकी रहता
रीत रहा है ये सावन का मधुमाष
तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
जुल्फ़ें से हटकर नजरे मेरी
बदन की गहराई में उतरती
इधर अटकती उधर रूकती
पर तन से नजर नहीं हटती
रुक ही जाती तेरे लहराते दुपट्टों पर
देखता कहता की काश तू मिलती
तुझे मृगनयनी कहूँ नाजनीन कहूँ
इसी उधेड़बुन मेरी नजरें लगी रहती
तुम्हें जब जब अपने में अपूर्णता का आभाष हो
मुझे याद कर लेना तुझ में पूर्णता को बताने को
तुझे देखते ही तुझसे लिपटकर रोने को मैं होता
कहता- क्यों रोके हो अबतक लिपटने से मुझको

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