Friday, July 15, 2016

तूझसे दोस्ती है या भक्ति या प्यार

तूझसे दोस्ती है या भक्ति या प्यार

रखी कहाँ तूने दोस्ती
अपने दुनिया में शामिल ही नहीं किया
हम रह ए तड़पते
तूने बिना गौर फरमाये छोड़कर चल दिया

तोहमत तुझे ना दूँ तो किसे दूँ
तुमसे ही तो मैं जुड़ा था 
दूसरे लोग तो बस नाम के थे
केवल मैं तुझसे जुड़ा था 

छुकर देखो हमें 
रोम रोम में तेरा नाम मिलेगा
तेरी यादें अंतर्मन में बसी है
हरवक्त तेरा मुस्कुराहट मिलेगा

नहीं ढिंढोरा पिटूँगा
नहीं कुछ चीखूंगा चिल्लाऊंगा
तेरे याद में तेरे तड़पन में
रोम रोम से तेरा नाम पुकारूँगा

हूँ मैं इस ज़मीन पर
तो हूँ मैं किसलिए सोचता हूँ 
तू मेरे इतने अजीज हो
पर तुम इतने दूर क्यों,सोचता हूँ 

जब भी तुझे देखा
ऐसा लगा तुम मेरे अपने हो 
तुम्हें कोई कष्ट ना हो
चाहे मुझे लाख दुःख सहने हो 

तेरे आँखों में जो जादू है 
उस कशिश की क्या मिसाल दूँ
तुम दूर हो पता ही नहीं चलता
यादों में ही वो जादू कहता-आ मिला दूँ 

तेरे जादू के इस बात पर
मुस्कराहट निकलती मेरे चेहरे से
फिर कहता-खोने दे तबतक उन आँखों में
जब वो आएंगे, मिल लूँगा तस्सली से

इस तस्सली की बात आते ही 
सचमुच तुझसा मैं खिलखिला पड़ता 
तुम दूर हो या नजदीक 
यादों में हकीकत सा अंग से लगा लेता

रोम रोम में राम है कैसे हनुमान को 
इसकी अनुभूति भी मिलता रहता 
तुझसे दोस्ती है या भक्ति या प्यार
सच मुझे कुछ भी पता नहीं चलता 

No comments:

Post a Comment