Tuesday, June 24, 2014

चलो तुम्हें मनाते हैं

चलो तुम्हें मनाते हैं 
विनती करते हैं 
गिरगिराते हैं 
गुनगुनाते हैं 
हँसाते  हैं 
मुस्कुराते हैं 
मनाते हैं 
अपने ही रूप को 
मेरे सोने रूप को 
जो बैठे हैं 
शहरो के शहर में 
दिलो की बगिया में 
बादियों की बादी में 
मन की चाहत में 
गुमसुम चुपचाप 
एक नदी की तरह 
कलकल करते हुए 
बहती जा रही है 
शांति से 
निर्भीक सा 
एक अति-शांत वातावरण में.

चलो तुम्हें मनाते हैं
साथ साथ गुनगुनाते हैं 
तुम्हें हँसाते  हैं 
संग-संग मुस्कुराते हैं.

चलो तुम्हें मनाते हैं ........  :) 


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