Tuesday, June 24, 2014

आशा की धागा और उहापोह

कितनी नशीली है आँखे  तेरी 
नहीं देता नशा चाहे भरा हो शराब 
मैंने तो शाकी पीनी ही छोड़ दी 
जब से रूबरू हुआ तेरा नशीला शबाब 

अगर पीता रहता मैं कोई शाकी 
मुझे पता था बना लेता वो साथी 
जब नहीं है आज तेरा साथ 
तेरी तस्वीर बन गई है साथी 

दिल नहीं करता कि दिमाग लगाऊ 
जब भी सोचूँ तेरे बारे में - मेरे बारे में 
दिल करता बस मैं तुझमें खो जाऊं 
जन्मों-जन्मों तक अतृप्त प्यास में 

विश्वास नहीं - तो आज़मा के देख ले 
सिमट जायेंगे सचमुच रूह के सारे रास्ते 
मैं तो हुँ तेरे सामने कच्चा खिलाड़ी 
असल राहगीर बनूँगा तो तेरे चलते 

देखने को तुझको जी करता है मुझे 
दूर से अपनी तो नई तस्वीर दिखा दे 
कहने को तो बस जी लेता हुँ मैं 
पर असल में तो कम से कम जीला दे

क्यों नहीं तुम मुझसे बात करते
क्यों रोके हो बात-चित अपनी 
बहुत दिल करता है आवाज़ सुनु
हेलो की आवाज़ लगती थी अपनी 

बहुत कष्ट होता है मुझे
कि तुझे होता होगा बहुत कष्ट
दीखता नहीं कोई तेरा सहारा
आशा की धागा टुटा तो हो जाऊंगा नष्ट 

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