Thursday, May 19, 2016

माना कि हम तेरे काबिल नहीं

माना कि हम तेरे काबिल नहीं
फिर भी कभी तो बोला करो 
इतना अंजान भी तो नहीं हम 
मुझसे भी अब तो बोला करो 

माना कि तेरे आँखों में हैं चमक

पर इन आँखों को सवाँरा करो 
इन आँखों से ही तो मृगनयनी हो
इन आँखों में सुरमा लगाया करो 

माना कि हम तेरे काबिल नहीं

पर कभी हाल भी तो पूछा करो 
हम शिकायत भी कर सकते नहीं
पर मुझे भी तो अब समझा करो 

तुमसे बोलने की बहुत चाहत है

हमसे भी तो बोल लिया करो
शिकवा करूँ तो किससे करूँ
मुझे भी तो अब पहचाना करो

माना कि तुम बहुत सक्षम हो

पर दिल होता मेरे घर रहा करो
कैसे तुम घर से दूर रहते होगे
तुम कोई कष्ट महसूस ना करो

माना कि तुम हो बहुत खुद्दार

पर मुझे इतना तो पराया ना करो
तुम्हें देखते ही लगता तुम अपने हो 
जब भी जरूरत हो कहा करो 

माना कि हम तेरे काबिल नहीं

फिर भी कभी तो बोला करो 
इतना अंजान भी तो नहीं हम
हो सके तो मिल कर रहा करो

नहीं आने दूंगा कोई आंच कभी

मैं भी हूँ खुद्दार तुम्हारे ही जैसा 
बस हूँ तेरे दोस्ती का कायल 
तुम मुझे दीखते ठीक मेरे जैसा 

माना कि हम तेरे काबिल नहीं

फिर भी कभी तो बोला करो 
इतना अंजान भी तो नहीं हम 
मुझसे भी अब तो बोला करो

No comments:

Post a Comment