Tuesday, May 17, 2016

रास्ते पर चलते जाना है

कितनी दूर चल कर आया हूँ
कितनी दूर चल कर जाना है
कुछ  नहीं पता इस राह का
फिर भी चलते ही जाना है 

जितना पता है इस राह का 
उसमें सारे पते खो जाते है 
नदी खो जाते हैं  समुद्र  में 
समुद्र का ठिकाना ही नहीं है

कितनी दूर चलकर आया हूँ
कितनी दूर चलकर जाना है 
तुम हो नहीं साथ, फिर भी 
रास्ता का नियम निभाना है 

कैसे कहूँ-चलते चलते थक गया हूँ
तुझे देखा तो ऐसा लगा नहीं थका हूँ 
तेरे मुस्कराहट में सच ऐसे खो गया 
जैसे राह का भर्मजाल से मैं परे हूँ 

तुम कितनी दूर चलकर आये हो
जिसमें तुम थके नहीं दीखते हो 
क्या लेकर साथ मुझे सीखा दोगे
इस रास्ता का नियम निभाना है 

मजबूरी होगी तुम्हें भी शायद 
तब ही तो तुम कुछ नहीं बोलते 
सामने से यूँ निकल जाते, जैसे
तुम एक दूसरे को नहीं जानते 

सच तुम्हें भी तो आगे बढ़ना है
तुम्हें भी तो असीम को पाना है 
मेरे कारण तुम्हें देर ना हो जाय
राह का नियम तुम्हें भी निभाना है 

कितनी दूर चलकर आया हूँ
कितनी दूर चलकर जाना है 
तुम हो नहीं साथ, फिर भी 
राह पर मुझे चलते जाना है 





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