Monday, June 27, 2016

कितना अच्छा सफर है हमारा

कितना अच्छा सफर है हमारा
बगल में साथ होता है तुम्हारा
मगर फिर भी हम अंजान से हैं
सफर कट जाता है हमारा तुम्हारा 

इतनी इनायत तो किये हो 
कि आज नींद को भगाए हुए हो 
क्या डर गए मेरे बातों से 
कि मन बच्चा है तुझे छूने से 

कितना अच्छा सफर है हमारा 
संग मुस्कुराहट होता है तुम्हारा
मगर फिर भी हैं हम अंजान से
ऐसा ही है ये दुनिया हमारा 

लाखों चलते हैं इस शहर में 
गुम हो जाते हैं रोज सफर में 
जानने की कोशिश नहीं करते
कैसे आते जाते हैं इस शहर में 

कितना अच्छा सफर है हमारा
संग साथ होता साया तुम्हारा
दिख जाते हैं साये के करत्व 
संतोष कर लेता है मन हमारा 

कभी तन कर तेरा बैठना 
कभी पैर पे पैर का रखना 
कभी उकड़ू लगा कर टेकना
चंचल सी मृग्नयन से देखना 

कितना अच्छा सफर है हमारा
दूर रहकर भी संग है तुम्हारा 
तेरी बलखाती जुल्फों का उड़ना
पास होता तड़पता दिल हमारा 

कितना अच्छा सफर है हमारा
पास होकर भी संग नहीं तुम्हारा 
कितना अच्छा सफर है हमारा
बगल में साथ होता है तुम्हारा 

चन्द शेर अर्ज़ है ...

इस तरह शेर अर्ज़ करता रहूँ 
ये दिल नहीं चाहता
तेरे संग हर कदम फ़र्ज़ निभाऊँ
ये दिल बस यही चाहता 

तेरी तबियत ख़राब है या अच्छी
पूछ नहीं सकता 
तेरी तबियत का ख्याल रखूँ 
हर वक्त ये दिल चाहता 

तुझे देखते ही पार्वती होने सी होती अनुभूति
कि सच तू है मेरे शंकर की जीती जागती मूर्ति 

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