कितना अच्छा सफर है हमारा
बगल में साथ होता है तुम्हारा
मगर फिर भी हम अंजान से हैं
सफर कट जाता है हमारा तुम्हारा
इतनी इनायत तो किये हो
कि आज नींद को भगाए हुए हो
क्या डर गए मेरे बातों से
कि मन बच्चा है तुझे छूने से
कितना अच्छा सफर है हमारा
संग मुस्कुराहट होता है तुम्हारा
मगर फिर भी हैं हम अंजान से
ऐसा ही है ये दुनिया हमारा
लाखों चलते हैं इस शहर में
गुम हो जाते हैं रोज सफर में
जानने की कोशिश नहीं करते
कैसे आते जाते हैं इस शहर में
कितना अच्छा सफर है हमारा
संग साथ होता साया तुम्हारा
दिख जाते हैं साये के करत्व
संतोष कर लेता है मन हमारा
कभी तन कर तेरा बैठना
कभी पैर पे पैर का रखना
कभी उकड़ू लगा कर टेकना
चंचल सी मृग्नयन से देखना
कितना अच्छा सफर है हमारा
दूर रहकर भी संग है तुम्हारा
तेरी बलखाती जुल्फों का उड़ना
पास होता तड़पता दिल हमारा
कितना अच्छा सफर है हमारा
पास होकर भी संग नहीं तुम्हारा
कितना अच्छा सफर है हमारा
बगल में साथ होता है तुम्हारा
चन्द शेर अर्ज़ है ...
इस तरह शेर अर्ज़ करता रहूँ
ये दिल नहीं चाहता
तेरे संग हर कदम फ़र्ज़ निभाऊँ
ये दिल बस यही चाहता
तेरी तबियत ख़राब है या अच्छी
पूछ नहीं सकता
तेरी तबियत का ख्याल रखूँ
हर वक्त ये दिल चाहता
तुझे देखते ही पार्वती होने सी होती अनुभूति
कि सच तू है मेरे शंकर की जीती जागती मूर्ति
बगल में साथ होता है तुम्हारा
मगर फिर भी हम अंजान से हैं
सफर कट जाता है हमारा तुम्हारा
इतनी इनायत तो किये हो
कि आज नींद को भगाए हुए हो
क्या डर गए मेरे बातों से
कि मन बच्चा है तुझे छूने से
कितना अच्छा सफर है हमारा
संग मुस्कुराहट होता है तुम्हारा
मगर फिर भी हैं हम अंजान से
ऐसा ही है ये दुनिया हमारा
लाखों चलते हैं इस शहर में
गुम हो जाते हैं रोज सफर में
जानने की कोशिश नहीं करते
कैसे आते जाते हैं इस शहर में
कितना अच्छा सफर है हमारा
संग साथ होता साया तुम्हारा
दिख जाते हैं साये के करत्व
संतोष कर लेता है मन हमारा
कभी तन कर तेरा बैठना
कभी पैर पे पैर का रखना
कभी उकड़ू लगा कर टेकना
चंचल सी मृग्नयन से देखना
कितना अच्छा सफर है हमारा
दूर रहकर भी संग है तुम्हारा
तेरी बलखाती जुल्फों का उड़ना
पास होता तड़पता दिल हमारा
कितना अच्छा सफर है हमारा
पास होकर भी संग नहीं तुम्हारा
कितना अच्छा सफर है हमारा
बगल में साथ होता है तुम्हारा
चन्द शेर अर्ज़ है ...
इस तरह शेर अर्ज़ करता रहूँ
ये दिल नहीं चाहता
तेरे संग हर कदम फ़र्ज़ निभाऊँ
ये दिल बस यही चाहता
तेरी तबियत ख़राब है या अच्छी
पूछ नहीं सकता
तेरी तबियत का ख्याल रखूँ
हर वक्त ये दिल चाहता
तुझे देखते ही पार्वती होने सी होती अनुभूति
कि सच तू है मेरे शंकर की जीती जागती मूर्ति
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