चन्द छंद नजर पर...
गुस्ताखी तो मुझसे होगी ही
जब भी तुम होगे महसूस में
चाहे यादों में या सपनो में
या सामने या फिर कब्र में
कैसे देखूँ तुझे दोस्त के नज़र से
तुम्हीं क्यों नहीं दोस्त बन जाते
दिल करता है देखूँ तुझे नज़र भर
तुम्हीं क्यों नहीं नज़र आ जाते
तुझे नजर भर देख लूँ कैसे भी
तेरे दोस्त के नजर में देखता हूँ
तुझको उन नजरों में ढूँढता हूँ
आ जाओ नजर भर सोचता हूँ
जब भी वो नजरें याद आ जाते
यादों में ही उन नजरों में खो जाता
उनके उठते और गिरते नजर में
लहरों की तरह मैं बहता जाता
इस नजर का क्या भरोसा
एक बार तो नजर आ जाओ
ऐसे ही नजरें परेशान रहती
मेरे नजरों में तो समां जाओ
गुस्ताखी तो मुझसे होगी ही
जब भी तुम होगे महसूस में
चाहे यादों में या सपनो में
या सामने या फिर कब्र में
कैसे देखूँ तुझे दोस्त के नज़र से
तुम्हीं क्यों नहीं दोस्त बन जाते
दिल करता है देखूँ तुझे नज़र भर
तुम्हीं क्यों नहीं नज़र आ जाते
तुझे नजर भर देख लूँ कैसे भी
तेरे दोस्त के नजर में देखता हूँ
तुझको उन नजरों में ढूँढता हूँ
आ जाओ नजर भर सोचता हूँ
जब भी वो नजरें याद आ जाते
यादों में ही उन नजरों में खो जाता
उनके उठते और गिरते नजर में
लहरों की तरह मैं बहता जाता
इस नजर का क्या भरोसा
एक बार तो नजर आ जाओ
ऐसे ही नजरें परेशान रहती
मेरे नजरों में तो समां जाओ
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