कविता कभी तुकांत हो जाती है
कभी अतुकांत हो जाती है
जब भावना सुगबुगाती है
कुछ कहने को हो आती है
कविता अपनेआप बन जाती है
भावना व्यक्त हो जाती है
ऐसा लगता-वह सामने बैठी है
जैसे उसको ही सुनाती है
उस कॉफी के धुँए में
जो चेहरा नज़र आता है
वह अपना लगता है
उसे गुदगुदी लगाने को
दिल चाहता है
पकड़ कर चूम लूँ
ऐसा ही दिल चाहता है
कहाँ खोये थे
ऐसा पूछना चाहता है
तुझे भुला ही नहीं अबतक
नहीं भूलना आता है
आओ संग संग रह ले
हर समय चाहता है
तेरे संग गुनगुनाने को
दिल चाहता है
तेरे बालों से मैं खेलूँ
क्लिप से बँधे लट खोलता है
उन केशुओं के बदरी में
भींगना चाहता है
उन झील सी गहरी आँखों में
तैरना चाहता है
उस मृगनयनी मस्ती में
खोना चाहता है
तुझे कोई कष्ट ना हो
हर कष्ट लेना चाहता है
तेरे प्यार में रहना चाहता है
सपनों से निकाल कर
हकीकत में लाना चाहता है
कभी अतुकांत हो जाती है
जब भावना सुगबुगाती है
कुछ कहने को हो आती है
कविता अपनेआप बन जाती है
भावना व्यक्त हो जाती है
ऐसा लगता-वह सामने बैठी है
जैसे उसको ही सुनाती है
उस कॉफी के धुँए में
जो चेहरा नज़र आता है
वह अपना लगता है
उसे गुदगुदी लगाने को
दिल चाहता है
पकड़ कर चूम लूँ
ऐसा ही दिल चाहता है
कहाँ खोये थे
ऐसा पूछना चाहता है
तुझे भुला ही नहीं अबतक
नहीं भूलना आता है
आओ संग संग रह ले
हर समय चाहता है
तेरे संग गुनगुनाने को
दिल चाहता है
तेरे बालों से मैं खेलूँ
क्लिप से बँधे लट खोलता है
उन केशुओं के बदरी में
भींगना चाहता है
उन झील सी गहरी आँखों में
तैरना चाहता है
उस मृगनयनी मस्ती में
खोना चाहता है
तुझे कोई कष्ट ना हो
हर कष्ट लेना चाहता है
तेरे प्यार में रहना चाहता है
सपनों से निकाल कर
हकीकत में लाना चाहता है
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