एक गजल .... तुम कहाँ हो
मुद्दते बाद इश्क चढ़ी है तुम कहाँ हो
तेरे जुल्फों के साये में रह लूँ तुम कहाँ हो
माना कि तुम हो कोई बहती धारा
तेरे बाद नहीं खोजा कोई किनारा
मिले तो बहुत पर सब मशगूल थे जरा
सबकी चाहत थी तुम सा बहे धारा
पर बताओ भी अब तुम कहाँ हो
मुद्दते बाद इश्क चढ़ी है तुम कहाँ हो
गमों के साये हो, या हो कोई रैन बसेरा
तेरी यादें रही बराबर, रहा रब सा सहारा
तेरे मुस्कराहट को चाहूँ तुम कहाँ हो
अपने हँसी में खोने दो तुम कहाँ हो
अब बता भी दो कि तुम कहाँ हो
मुद्दते बाद इश्क चढ़ी है तुम कहाँ हो
मुद्दते बाद इश्क चढ़ी है तुम कहाँ हो
तेरे जुल्फों के साये में रह लूँ तुम कहाँ हो
माना कि तुम हो कोई बहती धारा
तेरे बाद नहीं खोजा कोई किनारा
मिले तो बहुत पर सब मशगूल थे जरा
सबकी चाहत थी तुम सा बहे धारा
पर बताओ भी अब तुम कहाँ हो
मुद्दते बाद इश्क चढ़ी है तुम कहाँ हो
गमों के साये हो, या हो कोई रैन बसेरा
तेरी यादें रही बराबर, रहा रब सा सहारा
तेरे मुस्कराहट को चाहूँ तुम कहाँ हो
अपने हँसी में खोने दो तुम कहाँ हो
अब बता भी दो कि तुम कहाँ हो
मुद्दते बाद इश्क चढ़ी है तुम कहाँ हो
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