प्रेम का रंग नदी सा कलकल बहता जाय
धारा का रूप लेकर निश्छल चलता जाय
सप्त रंगो के मेल में झील मिल करता जाय
सुहाना चकमक करता मधुरम् रंग बरसाय
सप्तक के तार में सा और प से सुर सजाय
कभी श्रृंगार कभी मल्हार का सरगम सुनाय
शब्दों को ऊँगली से महसूस करता जाय
प्रेम का रंग पलपल निश्छल बहता जाय
धारा का रूप लेकर निश्छल चलता जाय
सप्त रंगो के मेल में झील मिल करता जाय
सुहाना चकमक करता मधुरम् रंग बरसाय
सप्तक के तार में सा और प से सुर सजाय
कभी श्रृंगार कभी मल्हार का सरगम सुनाय
शब्दों को ऊँगली से महसूस करता जाय
प्रेम का रंग पलपल निश्छल बहता जाय
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