देखा जब तुम्हें इधर, वो ही नूर टपकता है
जैसा था वर्षों पहले, वो ही हूर चमकता है
देखने दो मुझे यूँही तुम,मुझे अपने नजर से
क्यों खामोश हो जाते, मेरे यूँ देखते रहने से
तुम नहीं जानते, तुम कितने अनमोल हो
देखते ही सब कुछ ठहर जाता,तुम हूर हो
मिलने दो मुझे तुम्हें मेरी तरह से
जिस भी तरह मिलना चाहता है
सावन की घटा बारिश बनकर
जब तेरे तनबदन पर टपकता है
खामोश है मेरी चाह तुमसे मिलने को
कई वर्षों से शायद कई कई जन्मों से
सुखा में तपकर भी चाह नहीं सुखा है
पल पल रुका है तेरे मिलन के आस से
तुम पढ़कर भी मेरा सन्देश, खामोश रह जाते हो
भेंट होने पर ऐसा भाव करते,जैसे जानते नहीं हो
कितना मैं टूट जाता हूँ तेरे ख़ामोशी से
कभी देखकर मुझे तुम अंदाजा लगाना
पर फिर भी मुस्कुराहट निकल पड़ती है
क्योंकि तुम्हें अच्छा लगता है मुस्कुराना
एक शेर अर्ज़ है -
मिलकर भी अंजान, सच कितनी बेकरारी है
तुमसे मिलने को हर शर्त मानने की तैयारी है
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