Wednesday, September 9, 2015

कई दिन से कर रहा मुझे लिखुँ तुझ पे गान

कई दिन से कर रहा मुझे लिखुँ तुझ पे गान
दूर से बैठ कर यहीं से छेड़ूँ मैं तुम पर तान 

तेरी बोल सुनने को तरसे मेरे सुने सुने कान
कहाँ बैठे हो गोरी छुपाकर अपनी मीठी तान

देखने को कर रहा वो हलकी हलकी मुस्कान
गोरे गोरे गालों वाली तेरी गुलाबी लाली जान

कहाँ छुपे बैठे हो चुलबुली सी अलबेली जान
कई दिन से कर रहा था कि लिखुँ तुझपे गान

यादों के सहारे जी रहा केवल पूरा हूँ अन्जान 
तुम कैसे हो नहीं बताने की क्यों ली तूने ठान 

पूछूं मैं किस से हाल तेरा बताओ भी मेरी जान
नयन तरस रहा देखने को मीठी मीठी मुस्कान 

लिखने को कर रहा था कई दिन से तुझ पे गान
खोने को कर रहा है तेरे मृगनयनों में मेरी जान 

तेरे आँखों के समंदर में डूब जाता हूँ मैं यादों में 
महकते हुए गुलाबी गुलाबों में हरे भरे बागों में 

गाने को कर रहा था कई दिन से तुझ पे गान
लिखूं मैं गाना सुनाऊँ छेड़कर मैं अपनी तान 

चिढ़ाने को कर रहा था कई दिन से तुम्हें युहीं 
छूने को दिल कर रहा था तुम्हें बातों से युहीं 

कहाँ छुपे बैठे हो अनाड़ी सुन भी लो मेरी तान 
लिखने को कर रहा  कई दिन से तुझ पे गान 

तुम पूछो न हमसे क्यों लिखते हो मेरी गान 
बस झूम लो पढ़कर मुस्कुराते हुए मेरी जान 

कई दिन से कर रहा मुझे लिखुँ तुझ पे गान
दूर से बैठ कर मैं सुनाऊँ तुझे अपनी तान 

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