Monday, September 14, 2015

यादों का पन्ना

यादों के पन्नों से निकलकर
याद आती है तेरी
दिल कुहुककर रह जाता है
कि क्यों हो ना सकी मेरी

यादों के पन्नों से निकलकर

याद आती है तेरी
दिल चहकने लगता है
जब याद आती है मृग्नयन तेरी

क्या आँखे थी तेरी

तेरे देखने से लगता था
किसी प्यासे की प्यास बुझ रही हो
तपिस से शीतलता मिल रही हो
रोगी को दवा मिल रही हो
भूखे को खाना मिल रही हो
किसी को दुआ मिल रही हो
और सारे तेरे सामने खड़े हो
नतमस्तक होकर
कि कब तुम देखोगे उन्हें 
बस तुम अपनी नजर से 
और वो तृप्त हो जायेंगे 
बस तेरे एक नजर देख लेने से
यादों के झुरमुट से निकलकर
जब याद करता हूँ 
सचमुच मैं तो तृप्त हो जाता था
तेरे देखने मात्र से

अब मैं कहाँ रह गया "मैं"

जब से "तेरा मैं" अलग हुआ
वजूद ही नहीं है "मेरे मैं" में
जब से तू मुझसे अलग हुआ

तुम खुदा थे मेरी,जहान थे मेरी

तुम्हें देखते ही खुदाई भूल जाता
तुम बने नहीं थे जुदाई के लिए
काश हमदम सा तू बन जाता

कब से इंतज़ार में था तेरा

कोई अबतक मिला ही नहीं
जो मिला है उसे मिलना ना कहो
वह तो मात्र साधन है सुविधा नहीं

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