Thursday, November 12, 2015

क्यों चीत्कार है


एक दार्शनिक ने बड़ा अच्छा विचार किया था ....

अरे कोई नहीं कुछ भुला
सबने ही कुछ नया किया
जीवन है बड़ा ही अनुपम
सबने कुछ प्रयोग किया 

एक धर्म एक राग एक रंग
सबने ही परित्याग किया 
विभिन्न रंगों को प्रश्रय दे
सबने ही अनुराग किया 

फिर क्यों यह चीत्कार उठा
क्यों रंगों का तिरस्कार उठा
सब के रंग हैं अद्भुत अनुपम 
फिर क्यों यह वैराग्य उठा 

बस ज्ञान लाओ प्रकाश लाओ
संग संग रहने का विचार लाओ
कण कण बना है उसी खुदा से
बस थोडा सा सामन्जस्य लाओ

हरतरफ शांति ही शांति है 
मन को थोडा तो शांत करो 
रूह केवल बोलने से नहीं 
रूह का रूह से अनुभव करो 

रूह ही निज है रूह ही सत्य है
उस सत्य का अवलोकन करो
ज्ञान पिपासा दिल से जगाकर
जग में सब के संग विचरण करो 

कोई नहीं मरता-मरता ये तन है 
रूह ही हम है रूह ही तुम है 
क्यों जीते जी मारता इस रूह को
रूह ज्ञान से रूही को पा लेता है 

कोई नहीं कुछ भुला है 
सबने ही कुछ नया किया है 
जीवन बड़ा ही अनुपम है 
सबने ही कुछ प्रयोग किया है 

बस एक जगह बैठकर विचार करो
क्या लाना है बैठकर अनुशंसा करो 
हर एक उसी खुदा का अंश है अंग है
एक मत से एक मत को स्वीकार करो !

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