Friday, August 21, 2015

ज़िन्दगी एक सोच भी है

किसी ने कहा ......
पतंग सी है ज़िन्दगी कहाँ तक जायेगी
ये उम्र भी एक न एक दिन कट जायेगी

नोप ....

ज़िन्दगी की दुरी अगर कब्र तक होती
तो ज़िन्दगी में इतनी मलाल ना होती
हम भी मुर्गियों की तरह उन्मुक्त चरते
और किसी के मुख का भोजन बनते

ज़िन्दगी के बहुत सारे छंद हैं
सिर्फ एक सोच पर मंद नहीं है
बहुतेरे छंद में एक सोच भी है
इसलिए जिसे ये छंद समझ आता

वो कहता - ज़िन्दगी एक सोच है
जिसमें किसी का सोच है
आगर तुम उसके सोच में आ गए
तो ये सोच प्रेम में बदल जाता
और हर पल गुनगुनाता ..

ज़िन्दगी के राह में हम चलते चले गए
तेरे संग संग हम बहते हुए चलते गए

इसी सोच से कभी कभी 
गीता का ज्ञान निकलता 
जीवन का सार कहलाता
तभी तो यह है निकलता .....

अज्ञान ना होता
ये दुनिया ना होती
अज्ञान से ही ये दुनिया है
अज्ञान है तभी ये दुनिया है

अगर अज्ञान ना होता
ना हम होते ना तुम होते
अज्ञान से ही तुम तुम रहे
ज्ञान लेकर भी मैं क्या कर लिया

किस सोच से तुम दुरी बनाये बैठे हो
मेरी सोच में तुम भी मेरी एक सोच हो

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