Saturday, October 29, 2016

तोड़ दिए तूने प्रीत के सपने

तोड़ दिए तूने प्रीत के सपने
बुनने लगे तुम अपने ही सपने
कैसे कैसे मैंने दिन थे बिताये
सोचा था तुम सच करोगे सपने

सामने रहकर भी दूर दूर से रहे
हर रोज तेरे लिए तरसते ही रहे
इतनी बेरुखी हमसे तूने दिखाई
छोड़ तुम चले,हम तड़पते ही रहे

मिलते ही तो क्या तेरा कम हो जाता
तेरे अंदर का प्यार क्या मैं छीन लेता
इतना लिख के भी जब नहीं समझे
सामने से बोलकर क्या प्यार मिलता

तुम भी दिखे जमाने सा बेदर्द होकर
महसूस ना किये रूह को समझकर
हम रोज इन्तजार में तड़पते ही रहे
तुम कैसे थे यार,तोड़ दिए तड़पाकर





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