Saturday, December 26, 2015

हवा सा लिपट कर - एक ग़ज़ल

हवा सा लिपट कर - एक गजल ...


हवा सा लिपट कर तुझसे प्यार करूँ

दिल के  धक धक पर मैं वार करूँ 
जुल्फों को हवा से उड़ाता जाऊँ 
झील सी गहरी आँखों में खोता जाऊँ

हवा सा लिपट कर तुझसे प्यार करूँ ..


तेरे कजरारी नयनों से बारिश लाऊँ 

उस बारिश में तुझे तन मन से भिंगाउँ 
उन बूँदों की चमक में अपना खो जाऊँ 
क्या हाल है जनाब का मैं पूछता जाऊँ 

हवा सा लिपट कर तुझसे प्यार करूँ ..


तेरे श्वेत श्याम तस्वीर में मैं रंग भर दूँ 

अंग अंग में रंग भर पूरा रंगीन कर दूँ 
गोरे गोरे गालों को रंग गुलाबी कर दूँ 
नाजुक से होठों को  लाली से भर दूँ 

हवा सा लिपट कर तुझसे प्यार करूँ ..


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