Friday, March 13, 2015

तन और मन

तन और मन
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जो  है  ही नहीं  इस तन का 
वह क्यों फ़िक्र करे इस तन का

तन  तो है एक सराय
यह कभी समझ न आए 
जब तक समझे-समझे
तब चलने की बारी आए

जो  है  ही नहीं  इस तन का 
वह क्यों फ़िक्र करे इस तन का

तेल लगाओ-फुलेल लगाओ
सुगंध लगाओ तन का
मन  में ये कभी नहीं घुसता 
रह जाता होकर इस तन का

जो  है  ही नहीं  इस तन का 
वह क्यों फ़िक्र करे इस तन का

कहत कबीर सुनो भाई साधु
क्या मालिश करूँ  इस तन का
तन से तन का परवरिश  होता
फिर  भी  नहीं होता किसी तन का

जो  है  ही नहीं  इस तन का 
वह क्यों फ़िक्र करे इस तन का

राग लगा  ले, रंग जमा ले
अंग अंग सजा ले इस तन का
तन से ऊपर एक बार तो सोच ले
यह मनवा  नहीं है इस तन का 

जो  है  ही नहीं  इस तन का 
वह क्यों फ़िक्र करे इस तन का


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