Friday, January 30, 2015

यह दुनिया है खुदा की एक सोच

यह दुनिया सही मे
अज्ञान से ही है चलता
ज्ञान मे तो यह बस
खुदा तक ही सीमित रहता

यह दुनिया सही मे
खुदा के सोच से है चलता
नहीं सोचा होता "खुदा" अगर
ये दुनिया खुदा तक ही सीमित रहता

ना कोई दुख है न दर्द है
ना ही है सुख का किनारा
ये तो बस एक सोच है
जो बनता रहता सहारा

अगर तरंग उठती नहीं-गिरती नहीं
तो कैसे बहता जाता तरंग की धारा
दिल का धक-धक भी तो तरंग सा है
सीधा चलने पर कहाँ रहता जीवन-धारा

ज्ञान आने पर कितना चैन है मिलता
बेचैन कर देता है अज्ञान की धारा
"खुद" का आभास जिसको भी हो जाता
खुदा भी आता देने "खुद" को सहारा

कितना अच्छा शब्द "खुद" बनाया किसी ने
ज़रूर उसने "खुदा" मे देखा होगा "खुद" को
ज्ञान मे कोई "खुद" को अपने कष्ट ना देता
अज्ञान मे ही वह मार देता किसी "खुद" को

संभालना बिगड़ना ही तो है जीवन
नहीं संभला तो फिर गिरेगा कौन
"खुद" ही गिरता "खुद" ही संभालता 
इसीलिये तो रहता "खुदा" भी मौन

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